मथुरा : कान्हा की नगरी में खेली गई फूलों की होली

मथुरा. कान्हा की नगरी मथुरा (Mathura) में आज फूलों की होली का खुमार छाया रहा. गोकुल स्थित  गुरु शरणानंद जी के रमणरेती आश्रम में पारंपरिक होली खेली गई. सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ प्राकृतिक गुलाब, गेंदा, टेसू के कई क्विंटल फूलों से होली खेल भगवान भक्त और संत सभी मदमस्त दिखाई दिए.

इस अलौकिक होली के सुखद आनंद का साक्षी प्रख्यात कथावाचक रमेश भाई ओझा सहित कई बड़े संत बने. कोरोना के चलते इस बार पर 90वें गोपाल जयंती महोत्सव में होली तो खेली गई लेकिन सिर्फ फूलों से. जबकि हर बार टेसू के फूलों से बने रंग, अबीर-गुलाल इस होली के आनंद की छटा को और चार चांद लगाया करते थे.राधा कृष्ण की इस पावन भूमि पर होली खेलने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु मथुरा पहुंचते हैं. ये ब्रज में जगह-जगह अलग-अलग तरीके से खेली जाने वाली होलियो का आनंद लेते हैं. गोकुल के रमणरेती आश्रम में राधा कृष्ण के स्वरूप के साथ भक्तजन और साधु संतो ने बड़े ही हर्षोल्लास के साथ होली खेली.

सबसे पहले मंदिर में विराजमान भगवान के अचल विग्रह की आरती उतारी गई. इस आरती की खास बात यह है कि पिछले 16 सालों से इस आरती में हाथी गजराज भी शामिल होते हैं और घंटे सूड़ से पकड़कर भगवान को रिझाते हैं. वहीं दूर-दराज से आए ब्रज की रज को अंगीकृत करते हुए रज में लौट लगाते है और अपने को धन्य मानते हैं.कृष्ण और राधा के अचल स्वरूप की आरती के बाद शुरुआत होती है उस होली के आनंद की जिसको भगवान भक्त और संतो को साल भर रहती है. जिसमें सबसे पहले गुरुशरणानंद महाराज राधा कृष्ण स्वरूप की आरती उतरते ही भगवान को आरती खेलने का न्योता देते है. न्योता मिलने के साथ ही राधा कृष्ण स्वरूप उन लीलाओं को जीवंत करते हैं, जो द्वापर में भगवान कृष्ण ने राधा के साथ की थी. जिसके बाद से ब्रज ओर विश्व मे होली खेलने की परंपरा शुरू हुई.

गुरु शरणानंद आश्रम में खेली गई इस परंपरागत होली में भगवान कृष्ण की मयूर लीला यमुना तट पर पानी भरने के लिए गोपियों से माखन मिश्री की मांग व हसी ठिठोली की लीलाओं का मंचन भी श्रद्धालुओं के लिए आनंदित करने वाला था. राधा कृष्ण के वाद संवाद, हंसी ठिठोली के बाद सखियों और राधा रानी ने जैसे ही प्रेम पगी लाठियों का कृष्ण और सखाओ पर प्रहार किया. वैसे ही प्रेम रस की बरसात गोकुल धाम में साक्षात दिखाई दी. इसी बीच भगवान के स्वरूपों और संतो पर भक्तों ने 2 टन फूलों की बरसात की ओर उसके बाद जो मनमोहक ओर अलौकिक नजारा था, वह आप भी देख रहे हैं.

फागुन के महीने में कान्हा की नगरी में ब्रज रज पर चलने के बाद जो आनंद मिलता है, उसका साक्षी बनने के लिए देवता भी इंद्रलोक से लालायित रहते हैं.ब्रज की होली पूरे विश्व में प्रसिद्ध है और ब्रज में अनेकों जगह अलग-अलग तरीके से होलियां खेली जाती हैं.

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