बर्फीले तूफान से जिंदा बचकर निकले यूपी के 4 दोस्त
25°C टेम्प्रेचर…चारों ओर बर्फ ही बर्फ थी। हमारे सिवाय वहां कोई दूसरा नजर नहीं आ रहा था। हमने आवाजें लगाईं, गाड़ी का हॉर्न बजाया, बर्तन बजाए, चीखे चिल्लाए भी, लेकिन हमारी बात सुनने वाला वहां कोई नहीं था।
12 जनवरी को दिन का वक्त था, हमारे ऊपर से एक हेलिकॉप्टर निकला। हमने उसे लाल कपड़ा दिखाया, हाथ हिलाया, आवाज भी लगाई लेकिन हेलिकॉप्टर में बैठे लोगों ने हमें नहीं देखा।
यह कहना है लेह से लौटे शिवम चौधरी का। गूगल मैप की वजह से रास्ता भटककर बर्फबारी के बीच फंसे आगरा के 4 दोस्तों ने 36 घंटे जिंदगी के लिए जंग लड़ी। इसमें आखिर के 3 घंटे बहुत खौफनाक रहे।
वो कहते हैं कि एक पल को लगने लगा था कि अब नहीं बचेंगे। परिवार को याद करके आंखों से आंसू छलक रहे थे। काफी जद्दोजहद के बाद हम जिंदा घर लौट सके।
शिवम के घर पर ही यश भी आ गए थे। उन्होंने बताया- हमारे साथ मधुनगर के रहने वाले जयवीर और सुधांशु भी थे। 9 जनवरी को कार से लेह के लिए निकल गए। 10 जनवरी को हम पंग में ही ठहर गए। 11 को मनाली के लिए निकले। नाकीला के पास बर्फ की वजह से रात करीब 2.30 बजे हमारी कार फिसलने लगी।
खाई में 20 फीट नीचे तक गिर गए। हम समझ गए कि मदद नहीं मिल सकेगी, इसलिए बर्फ के बीच ही गाड़ी में हीटर चलाकर रात काटी। दिन निकलने के बाद हमने आसपास देखा, वहां दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं था। थोड़ी दूर चलने के बाद हम कार के पास ही लौट आए, क्योंकि सर्दी बहुत ज्यादा थी।
वो दिन भी हमने हीटर के सहारे ही गुजारा। शिवम ने बताया- भयंकर सर्दी के बीच 36 घंटे गुजार चुके थे। कार छोड़कर जाने से 3 घंटे पहले हमें लगा अब नहीं बचेंगे। क्योंकि लगातार कार स्टार्ट रहने की वजह से उसका डीजल खत्म हो चुका था। जिस हीटर का हमें सहारा था, वो भी चलना बंद हो गया। खाने को भी कुछ नहीं था। मेरी और सुधांशु फौजदार की हालत ज्यादा बिगड़ने लगी थी। जय और यश भी ठीक नहीं थे। ठंड की वजह से शरीर अकड़ने लगा था। हमारे फोन भी बंद हो चुके थे।
फिर हमने डिसाइड किया कि अब यहां रुकने से बेहतर है कि जिंदगी के लिए जंग लड़ी जाए। क्योंकि अगर यहीं फंसे रहे तो बचना मुश्किल होगा। रास्ता बंद होने की वजह से यहां न कोई आने वाला और न ही हमारी आवाज सुनने वाला। फिर हमने प्लान किया कि पैदल चलने के सिवा हमारे पास कोई चारा ही नहीं है।
20 Km चलते हुए 13 जनवरी की दोपहर करीब 12.30 बजे हमें व्हिस्की नाला के पास बंद फैक्ट्री दिखी। हमने रात वहीं गुजारी। हम अंदर ही थे, जब बाहर हमें कुछ लोगों की आहट सुनाई दी। बाहर देखने पर पता चला कि ये तो पुलिस वाले हैं, वो हमें तलाशते हुए वहां पर पहुंच गए थे। अब लगा जान बच जाएगी। उन्हें देखकर हमारे आंसू निकल आए। लगा…जैसे भगवान ने हमारी मदद को कोई दूत भेजे हैं। हम उनसे लिपट गए और रोने लगे।

