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Khatu Shyam Ki Kahani: खाटू श्याम कौन हैं? क्यों कहते हैं तीन बाण के धारी

Khatu Shyam Ki Kahani: कलियुग में कमजोर और दुखी लोगों का सहारा खाटू श्याम हैं. खाटू श्याम के लिए सबसे लो​कप्रिय जयकारा है- हारे का सहारा श्याम हमारा. एकादशी के दिन खाटू श्याम के दरबार में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है, लेकिन सप्ताह में गुरुवार, शनिवार और रविवार को भी भक्त खाटू श्याम के दर्शनों के लिए आते हैं. खाटू श्याम को तीन बाण के धारी भी कहते है. आखिर खाटू श्याम कौन हैं?

खाटू श्याम कौन हैं?

कलियुग के खाटू श्याम महाभारत काल के बर्बरीक हैं. वे त्याग और भक्ति के मिसाल है. महाभारत के युद्ध के समय वे हारे का सहारा बनने का संकल्प लिया था. खाटू श्याम का दरबार राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव में है, वहां पर कलियुग में बर्बरीक का सिर प्रकट हुआ, फिर वहां के राजा को इसके संबंध में सपना आया. फिर उसने वहां पर खाटू श्याम मंदिर का निर्माण कराया. तब से खाटू श्याम का दरबार भक्तों के लिए खुल गया. वे ​कलियुग के जाग्रत देवता कहलाते हैं.

महाभारत के युद्ध का समापन हुआ तो जीत का श्रेय लेने के लिए पांडवों में विवाद हुआ तो बर्बरीक के सिर ने कहा कि यह जीत तो भगवान श्रीकृष्ण की नीति की हुई है. इससे प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को आशीर्वाद दिया कि कलियुग में श्याम के नाम से तुम्हारी पूजा होगी. जो तुम्हारे पास सहारे के लिए आएगा, उसकी मनोकामनाएं पूरी होंगी.बर्बरीक भीम के पौत्र और घटोत्कच के बेटे थे. वे बहुत वीर और पराक्रमी योद्धा थे. वे अपनी माता से युद्ध कौशल सीखे थे. भगवान शिव को कठोर तपस्या से प्रसन्न किया तो उन्होंने बर्बरीक को तीन अजेय बाण प्रदान किए थे. उन तीन बाणों में अजेय शक्ति थी, जिससे पूरा ब्रह्मांड खत्म हो सकता था. इस वजह बर्बरीक को तीन बाण के धारी कहा जाता है.

जब बर्बरीक को महाभारत युद्ध के बारे में पता चला तो उनके मन में युद्ध देखने की इच्छा हुई. उन्होंने अपनी माता को वचन दिया कि युद्ध में जो हार रहा होगा, उस पक्ष की ओर से वे लड़ेंगे. उस वजह से खाटू श्याम को हारे का सहारा कहा जाता है.

भगवान श्रीकृष्ण को यह बात पता चली तो वे चिंतित हो गए. अगर बर्बरीक इस युद्ध में शामिल हुआ तो इसका परिणाम बदल जाएगा. तब भगवान श्रीकृष्ण एक ब्राह्मण का रूप धारण करके बर्बरीक की परीक्षा लेने पहुंच गए. उन्होंने बर्बरीक से कहा कि सिर्फ 3 बाण से युद्ध लड़ने जा रहे हो. इस पर बर्बरीक ने कहा कि उनका एक ही बाण दुश्मनों को हराने के लिए काफी है.

इस पर भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इतने ही वीर हो तो एक बाण से इस पीपल के पेड़ के सभी पत्तों को छेद दो. बर्बरीक ने एक बाण से ही पूरे पीपल के पत्तों को छेद दिया. लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने एक पत्ता पैर के नीचे छिपा दिया था, इस पर बर्बरीक ने कहा कि आप अपना पैर हटा लें, क्योंकि उसके नीचे भी एक पत्ता है. पैर हटाते ही बाण ने उस पत्ते को भी छेद दिया.

यह देखकर भगवान श्रीकृष्ण बर्बरीक की वीरता से बहुत प्रसन्न हुए. उन्होंने बर्बरीक से दान के रूप में उसका ​सिर मांग लिया. इस पर बर्बरीक समझ गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं है. उन्होंने उनका वास्तविक परिचय जानना चाहा. तब भगवान श्रीकृष्ण वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए, तो बर्बरीक ने उनको अपना सिर दान कर दिया.

बर्बरीक की अंतिम इच्छा

सिर दान करने से पूर्व बर्बरीक ने अंतिम इच्छा जताई कि वे महाभारत का पूरा युद्ध देखना चाहते हैं. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके सिर को एक पहाड़ी की चोटी पर रख दिया. वहां से बर्बरीक ने पूरा युद्ध देखा.

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