मालेगांव बम धमाके केस में प्रज्ञा ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित बरी
दिल्ली. मालेगांव विस्फोट मामले में 17 साल बाद, एनआईए की विशेष अदालत ने गुरुवार को पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित सहित सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया है. विशेष न्यायाधीश अभय लाहोटी ने करीब 1000 पन्नों के फैसले में 15 अहम बिंदुओं पर जोर दिया, जिनकी वजह से आरोप साबित नहीं हो सके.
फैसले की 15 महत्वपूर्ण बातें
1- ‘संदेह पर सजा नहीं’ – कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल शक के आधार पर दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता, आरोपियों को शक का लाभ मिला.
2- प्रमाणों में खामियां – अभियोजन की दलीलों में विविध विसंगतियां थीं और सबूत अप्रमाणिक साबित हुए. कोई पुख्ता सबूत नहीं था.
3- प्रज्ञा का मोटरसाइकिल का मालिक होना सिद्ध नहीं – बाइक के चेसिस/इंजन नंबर मिटे हुए पाए गए, साक्ष्य त्रुटिपूर्ण थे.
4- प्रज्ञा पिछले 2 साल से संन्यासी थीं – सामग्रीगत वस्तुएं छोड़ चुकी थीं और बाइक उनका दीर्घकालीन स्वामित्व नहीं रहा.
5- कोई षड़यंत्र सिद्ध नहीं हुआ – किसी भी आरोपी के बीच साजिश के प्रमाण पेश नहीं किए गए.
6- प्रसाद पुरोहित के खिलाफ कोई RDX सप्लाई सबूत नहीं – विस्फोटक उसके आवास पर नहीं मिला, बम बनाने की भी पुष्टि नहीं.
7- लेनदेन का आतंकवाद से संबंध दोषी नहीं – पुरोहित से जुड़े ट्रांजेक्शन घरेलू उपयोग (घर निर्माण, LIC) के लिए थे न कि बम बनाने के लिए.
8- Abhinav Bharat का पैसा आतंकवाद पर खर्च नहीं हुआ – संगठन की आलोचना हुई, लेकिन बैंकिंग डेटा में हिंसा फंडिंग नहीं मिली.
9- UAPA की जांच अमान्य – UAPA पैनल अनुमोदन (sanction) आदेश दोषपूर्ण पाए गए, इसलिए UAPA लागू नहीं हुआ.
10- मेडिकल सर्टिफिकेट्स में हस्तक्षेप – अदालत ने चोटों की संख्या और सर्टिफिकेट्स में ‘अनियमितता’ (मैनिपुलेशन) दिखाने वाली रिपोर्ट्स की आलोचना की.
11- संशय पर्याप्त नहीं – कोर्ट ने दोहराया कि अपराध के लिए सीधे और पर्याप्त सबूत जरूरी हैं, केवल दृश्य/मान्यता आधारित अनुमान नहीं.
12- किसी भी आरोपी के विरुद्ध वैज्ञानिक फोरेंसिक सबूत अपुष्ट – एनआईए सीमित डेटा के साथ अपराध सिद्ध नहीं कर सकी.
13 – पंचनामा ठीक से नहीं किया गया और मोबाइल में कोई सबूत नहीं मिला.
14- चारों एजेंसियों द्वारा की जा रही जांच में कोई समन्वय नहीं है.
15- इन आरोपियों की संलिप्तता की कहानी में कई गलतियां थी और जांच एजेंसियों ने कई तकनीकी गलतियां भी कीं.
मालेगांव विस्फोट मामले में महत्वपूर्ण पड़ाव
– 29 सितम्बर 2008 को नवरात्रि की पूर्व संध्या पर मालेगांव के भिक्कू चौक पर हुए विस्फोट में 6 लोग मारे गये और 100 घायल हो गए.
– 4-5 नवंबर, 2008- लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित गिरफ्तार.
– 26-29 नवंबर 2008: 26/11 आतंकी हमला। महाराष्ट्र एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे, जो मालेगांव मामले के मुख्य जांच अधिकारी थे, एक आतंकवादी हमले में शहीद हो गए.
– 20 जनवरी, 2009: भारतीय दंड संहिता, मकोका और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धाराओं के तहत 4,528 पृष्ठों का आरोपपत्र दायर किया गया.
– 31 जुलाई, 2009 – 19 जुलाई, 2010 को मकोका पर लगे आरोप हटा दिए गए. मुंबई उच्च न्यायालय ने मको के खिलाफ आरोप बहाल कर दिए.
– दिसंबर 2010 – इस मामले में एनआईए शामिल हुई.
– 23 मई, 2013 – एनआईए ने मुंबई की विशेष अदालत में आरोपपत्र दायर किया.
– 24 जुलाई, 2015 – तत्कालीन विशेष सरकारी वकील रोहिणी सालियान ने दावा किया कि उन पर मामले में नरम रुख अपनाने के लिए दबाव डाला गया था.
– 15 अप्रैल, 2016 – एनआईए ने कहा कि वह न तो किसी का पक्ष ले रही है और न ही विरोध कर रही है.
– दिसंबर 2016 – निलंबित पुलिस अधिकारी महिबूब मुजावर ने दावा किया कि दो फरार आरोपियों रामजी उर्फ रामचंद्र कलसांगरा और संदीप डांगे ने उनकी हत्या की। पुलिस ने एनआईए को जांच का आश्वासन दिया.
– 25 अप्रैल, 2017 – बॉम्बे हाईकोर्ट ने कर्नल पुरोहित की ज़मानत खारिज की, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को जमानत दी.
– 21 अगस्त, 2017 – सुप्रीम कोर्ट ने कर्नल पुरोहित को जमानत दी.
– 23 अगस्त, 2017 – कर्नल पुरोहित को तलोजा सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया.
– 27 दिसंबर, 2017 – कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ मकोका मामला रद्द.
– 30 अक्टूबर, 2018 – सात आरोपियों के खिलाफ आरोप तय.
– 25 जुलाई, 2024 – एनआईए अदालत में अंतिम सुनवाई शुरू.
– 19 अप्रैल, 2025 – निचली अदालत ने पहले फैसला सुनाने के लिए 8 मई की तारीख तय की थी. हालांकि, अब मुंबई सत्र न्यायालय की विशेष एनआईए अदालत ने 31 जुलाई, 2025 को फैसला सुनाया है.