शंकराचार्य 2.18 लाख सैनिकों की चतुरंगिणी सेना बनाएंगे, पहले रोकेंगे-टोकेंगे फिर ठोकेंगे
वाराणसी में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सोमवार को चतुरंगिणी सेना बनाने का ऐलान किया। उन्होंने कहा- चतुरंगिणी सेना में 2 लाख 18 हजार 700 सैनिक होंगे। इसमें देशभर से लोग भर्ती होंगे।
उन्होंने बताया- यह सेना गोरक्षा, धर्म रक्षा, शास्त्र रक्षा और मंदिर रक्षा का कार्य करेगी। उनकी ड्रेस पीली होगी। हाथ में परशु (फरसा) होगा।
अविमुक्तेश्वरानंद ने चतुरंगिणी सेना बनाने के लिए श्रीशंकराचार्य चतुरंगिणी सभा का गठन किया है। इसमें 27 सदस्य होंगे। इसका अध्यक्ष वे खुद होंगे।
शंकराचार्य ने अपनी सेना के काम करने के तरीके बताए। उन्होंने कहा- पहले टोको, यानी टोकेंगे। कहो कि यह गलत हो रहा है। नहीं माने तो रोको। भाई, आपको रुकना पड़ेगा। नहीं तो फिर ठोको। ठोको का मतलब सीधे प्रहार करना नहीं है। मुकदमा करना, शिकायत करना और पंचायत करना भी ठोको में आएगा। ये सभी संवैधानिक तरीके अपनाते हुए काम करेंगी।
शंकराचार्य ने कहा- 1 पत्ती (टीम) में 10 लोग होंगे। 21 हजार 870 टीमें बनेंगी तो सेना तैयार हो जाएगी। भारत में अभी करीब 800 जिले हैं। अगर हर जिले में 27 टीमें, यानी 270 लोग तैयार हो गए, तो 2 लाख 16 हजार लोग तैयार हो जाएंगे।उत्तराखंड के बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक के मामले में शंकराचार्य ने कहा- मक्का-मदीना में 40 किलोमीटर पहले ही दूसरे धर्म के लोगों को रोक दिया जाता है। वह गलत नहीं है। ठीक है।
वैसे ही हमारे भी धर्म स्थल हैं। हमें भी अपनी पवित्रता चाहिए। हमें भी अपने ढंग से पूजा-पाठ करना है। वहां दूसरा क्यों जाएगा। हमारे यहां परंपरा है कि धार्मिक परिसरों में वही लोग जा सकते हैं, जो उस धर्म को मानते हैं।
शंकराचार्य को चतुरंगिणी सेना बनाने की जरूरत क्यों पड़ी
- आदि शंकराचार्य ने आठवीं सदी में 13 अखाड़े बनाए थे। इन अखाड़ों का गठन हिंदू धर्म और वैदिक संस्कृति की रक्षा के लिए किया गया था। धर्म की रक्षा के लिए नागा साधुओं की एक सेना की तर्ज पर ही अखाड़ों को तैयार किया गया था। जिसमें उन्हें योग, अध्यात्म के साथ शस्त्रों की भी शिक्षा दी जाती है। इन अखाड़ों को शंकराचार्य की सेना भी कहा जाता था।
- आजादी के बाद 1954 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद (ABAP) का गठन हुआ था। 1954 के प्रयाग (इलाहाबाद) कुंभ में मची भगदड़ के बाद, व्यवस्था सुधारने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर, 13 अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने मिलकर इस संस्था की स्थापना की।
- ऐसा माना जाता है कि अखाड़ा परिषद बनने के बाद इनकी कमान परिषद के अध्यक्ष के हाथ में आ गई और धीरे-धीरे शंकराचार्यों का कमांड इन पर से कम हो गया।
- 18 जनवरी (मौनी अमावस्या) को शंकराचार्य प्रयागराज माघ मेले में अपने शिविर से पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए रवाना हुए। पालकी को संगम नोज तक ले जाने को लेकर विवाद हो गया। इसके बाद शंकराचार्य धरने पर बैठ गए, लेकिन किसी भी अखाड़े ने उनका समर्थन नहीं किया।
- उस वक्त अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवींद्र पुरी ने कहा था- मुख्यमंत्री को लेकर शंकराचार्य की कड़े शब्दों में की गई टिप्पणियां गलत हैं। 10 दिन बाद 28 जनवरी को शंकराचार्य बिना स्नान किए काशी लौट गए। इसके बाद वे यूपी सरकार पर लगातार हमलावर रहे।
- उन्होंने ‘गो-प्रतिष्ठा धर्मयुद्ध’ यात्रा का ऐलान किया और साधु-संतों से साथ आने की अपील की। 7 मार्च को काशी से शुरू हुई यात्रा 11 मार्च को लखनऊ पहुंची। यहां शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने गोरक्षा अभियान का शंखनाद किया, लेकिन साधु-संतों की भागीदारी सीमित दिखी।
- 11 मार्च को शंकराचार्य ने कहा था कि साधु समाज में विकृति आ गई है। एक लकीर खिंच गई है। उन्होंने सभी अखाड़ों को पत्र लिखकर यह पूछने की बात कही कि वे किसके साथ हैं।

