मिडिल ईस्ट में युद्ध की आग भड़क उठी है. अमेरिका ने ईरान में धुआं-धुआं कर दिया
Iran-Israel War News: मिडिल ईस्ट में युद्ध की आग भड़क उठी है. अमेरिका ने ईरान में धुआं-धुआं कर दिया. इजरायल के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान पर बमबारी की. ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार डाला. तब भी अमेरिका का मन नहीं भरा है. वह अब रिजीम चेंज पर तुला है. तेहरान समेत ईरान के शहरों पर लगातार मिसाइलें बरसा रहा है. मगर ईरान भी झुकने को तैयार नहीं है. ईरान के बुलंद इरादों से अमेरिका बेचैन है. अब वह ईरान में ग्राउंड अटैक के बारे में सोच रहा है. डोनाल्ड ट्रंप भी अभी जमीनी अटैक को जरूरत नहीं बता रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ईरान में ग्राउंड फोर्स को तैनात करने की जरूरत है. बता दें कि पिछले चार दिनों से ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच जंग जारी है.
दरअसल, शनिवार को ईरान पर हमले करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने न्यूयॉर्क पोस्ट से कहा था, ‘हर प्रेसिडेंट कहता है कि जमीन पर कोई सैनिक नहीं होगा. मैं ऐसा नहीं कहता. मैं कहता हूं ‘शायद उसकी ज़रूरत नहीं है. मुझे नहीं लगता कि ईरान में ग्राउंड फोर्स तैनात करने की ज़रूरत होगी.’ अब सवाल है कि आखिर ईरान में जब अमेरिका का मकसद पूरा ही नहीं हुआ फिर जमीनी अटैक से डर क्यों रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप? आखिर क्या है वजह, जो डोनाल्ड ट्रंप ईरान में जमीनी अटैक की नहीं सोच रहे हैं. कहीं इसके पीछे 1979 का वो जख्म तो नहीं, जो अमेरिका को ईरान के रेगिस्तान में मिला था. चलिए जानते हैं कि आखिर 47 साल पहले ईरान में अमेरिका को कैसा जख्म मिला था.
दरअसल, बात 47 साल पुरानी है. 1978-79 में ईरान में राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी. शाह मोहम्मद रजा पहलवी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बढ़ गए थे. रजा पहलवी अमेरिका के करीबी सहयोगी थे. 1979 में रजा शाह को देश छोड़ना पड़ा और फरवरी में अयातोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी फ्रांस से लौटकर सत्ता में आए. नई इस्लामी सरकार ने अमेरिका को ‘महान शैतान’ बताया. स्थिति तब और बिगड़ी जब अक्टूबर 1979 में अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने कैंसर के इलाज के लिए शाह को अमेरिका आने की अनुमति दी. इससे ईरान में अमेरिका के प्रति गुस्सा भड़क उठा.
इसके बाद नवंबर 1979 में खामेनेई के समर्थन वाले करीब हजारों ईरानी छात्रों ने तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर हमला कर दिया. उन्होंने 66 अमेरिकियों को बंधक बना लिया. बंधक बनाने वाले छात्रों का समूह ईरान में हुई इस्लामी क्रांति का समर्थक था. बंधक बनाने वाले लोग ‘जासूसों का अड्डा’ मानते थे. उन्होंने शाह को वापस लौटाने और अमेरिकी हस्तक्षेप खत्म करने की मांग की. बाद में 13 बंधकों को रिहा कर दिया गया, मगर 52 बंधक 444 दिनों तक कैद रहे. यह अमेरिका के लिए अपमान से कम नहीं था. साथ ही यह संकट अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती थी. ईरान के आगे अमेरिका खूब गिड़गिड़ाया था. जब कूटनीतिक प्रयास विफल हुए तो कार्टर प्रशासन ने सैन्य विकल्प चुना.
अमेरिका का नाकाम ऑपरेशन ‘ईगल क्लॉ’
जी हां, ईरान से अपने बंधकों को छुड़ाने के लिए अमेरिका ने एक प्लान बनाया. अमेरिका ने अप्रैल 1980 में ‘ऑपरेशन ईगल क्लॉ’ शुरू किया. यह ऑपरेशन ईरान में अमेरिकी बंधकों को बचाने का अभियान था. इसमें सेना, नौसेना, वायुसेना और मरीन के जवान शामिल थे. प्लान था- आठ RH-53D हेलीकॉप्टर और C-130 विमान ओमान के पास से उड़ान भरकर तेहरान से 320 किमी दूर ‘डेजर्ट वन’ नामक रेगिस्तानी इलाके में मिलेंगे. वहां से हेलीकॉप्टर डेल्टा फोर्स और रेंजर्स को लेकर तेहरान की ओर बढ़ेंगे, जहां बंधकों को छुड़ाकर स्टेडियम या एयरपोर्ट से निकाला जाएगा.
कैसे अमेरिका को मिला जख्म
लेकिन अमेरिका का यह ऑपरेशन असफल रहा. ईरान के रेगिस्तान में अमेरिका को मुंह की खानी पड़ी. रेतीले तूफान और तकनीकी खराबी से अमेरिका के हेलिकॉप्टर आपस में ही टकरा गए. इस क्रैश में आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए. मकसद तक अमेरिका पहुंच नहीं पाया. एक भी बंधक नहीं छुड़ा पाया. यह ‘क्रैश’ अमेरिका के लिए अपमानजनक जख्म साबित हुआ. इसके बाद अमेरिका हाथ पर हाथ रखकर बैठा रहा. जब जनवरी में 1981 में रोनाल्ड रीगन की सरकार बनी तब जाकर ईरान ने बंधकों को रिहा किया.

