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पत्नी को पढ़ा कर बनाया नर्स तो उसने कर ली दूसरी शादी!,शंभु बने कलयुग के श्रवण

पटना. राजधानी पटना स्थित महावीर मंदिर की ओर से श्रवण कुमार पुरस्कार का ऐलान किया है. यह पुरस्कार उस बेटे बेटियों को दिया जाता है जो अपनी मां बाप की सेवा निस्वार्थ भाव से करते हैं. इस बार पटना के पोस्टल पार्क में रहने वाले शंभू चौधरी को प्रथम पुरस्कार के लिए चुना गया है. 29 दिसंबर को आयोजित कार्यक्रम में इन्हें सम्मानित किया जायेगा.

आपको जानकर हैरानी होगी कि शंभू ने अपने बुजुर्ग पिता की सेवा के लिए अच्छी सैलरी वाली नौकरी तक छोड़ दी. जिस पत्नी को उन्होंने आठवीं क्लास से आगे पढ़ाया, नर्स बनाया और अपने पैरों पर खड़ा किया, उसी ने उनका साथ छोड़ दिया. इसके बावजूद शंभू चौधरी निस्वार्थ भाव से अपने पिता की सेवा में जुटे हैं. उनकी दिनचर्या सुबह से लेकर रात तीन बजे तक सिर्फ और सिर्फ पिता की देखभाल के इर्द-गिर्द घूमती है.

मां के अंतिम दिनों में सेवा करने का है मलाल
शंभू बताते हैं, “मैं बांसुरी वादक हूं. वृंदावन में कथाओं के दौरान बांसुरी बजाया करता था. एक कथा के लिए करीब 15 हजार रुपये मिल जाते थे. यह सात दिनों की होती थी. लेकिन लॉकडाउन के दौरान पिताजी की तबीयत ज्यादा खराब होने लगी. इसके बाद मैंने फैसला किया कि अब दिन-रात पिताजी की सेवा में ही रहूंगा, इसलिए अपनी नौकरी छोड़ दी. फिलहाल मेरी एक छोटी-सी मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान है. जब पिताजी दिन में खाना-पीना खाकर सो जाते हैं, तो शाम में कुछ घंटों के लिए दुकान चला जाता हूं. सूरज ढलते ही वापस लौट आता हूं और फिर देर रात तक पिताजी की सेवा में जुटा रहता हूं.”

वो आगे कहते हैं कि जब मेरी मां जीवन के अंतिम दिनों में थी तो मैं उनकी सेवा नहीं कर पाया. इसका मुझे मलाल आज तक है. इसलिए अब जब तक पिताजी जीवित रहेंगे, मेरा पूरा जीवन इनकी सेवा में समर्पित है.

सुबह दस बजे से, रात तीन बजे तक सिर्फ सेवा
अपने पिताजी की दिनचर्या बताते हुए शंभु कहते हैं, “पिताजी अब बेड से उठ पाने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए उनकी सारी दिनचर्या बिस्तर पर ही होती है. सुबह उठते ही मैं उनका नित्यक्रिया संबंधी काम करवाता हूं. इसके बाद चाय-पानी देता हूं और दो से ढाई बजे के बीच उन्हें खाना खिलाता हूं. खाना खाकर वह सो जाते हैं. इसके बाद मैं अपना खाना खाता हूं और फिर दुकान की ओर निकल जाता हूं.

शाम को सूरज ढलने पर जब दुकान से लौटता हूं, तो सबसे पहले पिताजी के बिस्तर की सफाई करता हूं. इसके बाद फिर उन्हें खाना और पानी पिलाता हूं. चूंकि वह बिस्तर से उठ नहीं पाते, इसलिए मुझे अपने हाथों से ही उन्हें खाना और पानी पिलाना पड़ता है. यह सब करते-करते रात के 12 बज जाते हैं, उसके बाद मैं खाना खाता हूं. उन्हें भूलने की बीमारी है, इसलिए कभी-कभी मुंह में खाना लेकर भूल जाते हैं. ऐसे में बहुत प्यार और धैर्य के साथ उन्हें समझाना पड़ता है. इसके बाद दो-तीन घंटे उनके पास बैठकर उनके पैर दबाता रहता हूं. जब वह पूरी तरह से सो जाते हैं, तब करीब रात तीन बजे मैं सोने जाता हूं.”

जितने साल जिएंगे कष्ट नहीं होने देंगे
शंभू भावुक होते हुए आगे कहते हैं, “पिताजी की उम्र अब 80 साल से ज्यादा हो चुकी है. वह अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में हैं. उन्होंने अपना पूरा जीवन हमें पालने और आगे बढ़ाने में लगा दिया. आज जब वह बुढ़ापे की इस अवस्था तक पहुंच गए हैं, तो उनकी देखभाल करना मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है. मैं नहीं चाहता कि मेरे सामने वह किसी तरह का कष्ट झेलें. इनकी स्थिति ऐसी है कि वह मुश्किल से तीन-चार साल और जीवित रह सकते हैं, इसलिए जब तक वह इस धरती पर हैं, तब तक मैं उन्हें किसी भी तरह की तकलीफ नहीं होने दूंगा.”

वहीं, शंभू के पिताजी भी लड़खड़ाती आवाज में कहते हैं, “शंभू चौधरी बहुत अच्छा आदमी है, मेरी खूब सेवा करता है” लेकिन अगले ही पल वह सब कुछ भूल जाते हैं.

शंभू का अपना परिवार बिखर गया
शंभू चौधरी की निजी जिंदगी भी दर्द से भरी रही है. जिस पत्नी को उन्होंने आठवीं कक्षा से आगे पढ़ाया, नर्सिंग का कोर्स करवाया और अपने पैरों पर खड़ा किया, उसी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली. उनका बेटा भी आज मां के साथ ही रहता है. आज भी अपने बेटे के सतह की तस्वीर इनके डीपी में लगी मिल जाती है.

दरअसल, बेटे की पढ़ाई के लिए शंभू ने मां-बेटे दोनों को दिल्ली भेजा था और अपनी सीमित कमाई से हर महीने खर्च भी भेजते रहे. लेकिन एक दिन अचानक उन्हें यह सच्चाई पता चली कि उनकी पत्नी ने दूसरी शादी कर ली है. यह खबर शंभू के लिए किसी झटके से कम नहीं था. वह पूरी तरह टूट गए. हालांकि, इस गहरे सदमे के बाद भी शंभू ने खुद को संभाला और अपने पिता को ही अपने जीवन का सहारा बना लिया. आज वह अपने बिखरे हुए जीवन में पिता की सेवा को ही अपना उद्देश्य मानकर जी रहे हैं.

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