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नोएडा स्पोर्ट्स सिटी घोटाला : पूरे प्रोजेक्ट में 3 मेन बिल्डर्स के नाम हैं, जानाडू, लोट्स ग्रीन और लॉजिक्स इन्फ्रा

‘हमने एक करोड़ रुपए से ज्यादा देकर फ्लैट खरीदा, लेकिन अब तक मालिकाना हक नहीं मिला। अपने ही घर में किराएदार की तरह रह रहे हैं। करीब डेढ़ साल पहले एक फ्लैट की छत टूटकर गिर गई थी। पुलिस में शिकायत करने पहुंचे तो हमें ही फटकार मिल गई। कहा कि बिना फ्लैट की रजिस्ट्री कराए एंट्री कैसे मिली।

नोएडा के सेक्टर-79 में महागुन मीराबेला में रहने वाले अशोक वर्धन को जो सपने दिखाए गए, वो पूरे नहीं हुए। स्पोर्ट्स सिटी की जगह उन्हें जंगल में बसा दिया गया। 3 BHK फ्लैट के लिए सवा करोड़ रुपए दे चुके हैं। फिर भी मालिकाना हक के लिए कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। ये कहानी सिर्फ अशोक वर्धन की नहीं है। स्पोर्ट्स सिटी में फ्लैट लेने वाले 30 हजार से ज्यादा खरीदार इसी परेशानी से गुजर रहे हैं।

नोएडा स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट का प्लान 2004 में नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी को भेजा गया और 2008 में मंजूर भी हो गया। 17 साल बाद भी यहां सिर्फ दो रिहायशी सोसाइटी ही खड़ी हैं। स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर कुछ नहीं बना, सिर्फ एक बोर्ड लगा है। 2021 में आई CAG की रिपोर्ट में स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट में 9000 करोड़ रुपए के घोटाले की बात सामने आई।

इसके बाद इसी साल मार्च में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देश पर CBI ने घोटाले को लेकर 3 केस दर्ज किए। इसमें 2011 से 2014 के बीच प्रोजेक्ट के अलॉटमेंट, डेवलपमेंट और अप्रूवल को लेकर कथित अनियमितता की शिकायतें हैं। मामला कोर्ट में है, लिहाजा कंस्ट्रक्शन से लेकर रजिस्ट्री तक सब पर रोक है। कोर्ट केस का हवाला देकर नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी भी मामले पर बोलने से बच रही है।

सबसे पहले हम नोएडा के सेक्टर-79 पहुंचे और स्पोर्ट्स सिटी में फ्लैट खरीदकर रह रहे लोगों से मिले। यहां अभी सिर्फ दो सोसाइटी बनी हैं। एक महागुन मीराबेला और दूसरी गौर स्पोर्ट्सवुड। महागुन मीराबेला में करीब 500 फ्लैट हैं। सभी में लोग रह रहे हैं। यहां हम अशोक वर्धन से मिले। वे कहते हैं, ‘2014 में स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर इसमें बुकिंग शुरू हुई थी। 2020 में हमें पजेशन मिला।‘बिल्डर ने हमसे कहा था कि नोएडा अथॉरिटी से हमें ऑक्युपेशन सर्टिफिकेट यानी OC मिल चुका है। इसलिए बिल्डर को हमने रजिस्ट्री के लिए पूरे पैसे दे दिए। अगले ही साल 2021 में अथॉरिटी ने बोर्ड मीटिंग में पास कर दिया कि जब तक स्पोर्ट्स सिटी मामले का हल नहीं निकलता, तब तक रजिस्ट्री नहीं होगी।‘

‘पहले एक बिल्डर को पूरी स्पोर्ट्स सिटी बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। बाद में उसने कई सारे छोटे बिल्डर्स को छोटे हिस्से डेवलप करने के लिए बेच दिया। ये सब कुछ अथॉरिटी के अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ।‘

यहीं रहने वाले जितेंद्र गोस्वामी बताते हैं, ‘दिसंबर 2013 की बात है। बिल्डर ने स्पोर्ट्स सिटी का लालच दिखाकर हमें मार्केट रेट से 1000 रुपए प्रति वर्ग मीटर से ज्यादा रेट पर फ्लैट दिया। बिल्डर ने हमसे कहा था कि सोसाइटी में भी जॉगिंग और साइकिलिंग ट्रैक होगा, लेकिन हमें जो सपने दिखाए गए, उनमें से कुछ भी नहीं मिला।‘

‘यहां स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर कुछ है ही नहीं, सिर्फ जंगल है। उस लैंड पर भी काफी लोगों ने कब्जा कर लिया है। अब वहां कचरा डंप कर रहे हैं। हम लोगों ने एक फ्लैट के लिए 1 करोड़ से डेढ़ करोड़ रुपए दिए हैं। फिर भी हमारे घरों की रजिस्ट्री नहीं हो रही है। हम AOA यानी अपार्टमेंट ओनर एसोसिएशन भी नहीं बना पा रहे हैं। इस वजह से बिल्डर मनमाना मेंटेनेंस ले रहा है।‘

संजय सिंह ने 2013 में फ्लैट की बुकिंग कराई थी। उनकी भी यही शिकायत है। वो बताते हैं, ‘उस वक्त ये फ्लैट 1 करोड़ से ज्यादा में मिला था। बिल्डर ने हमसे रजिस्ट्री का पेमेंट भी ले लिया, लेकिन अब तक रजिस्ट्री नहीं हुई। बिल्डर ने स्पोर्ट्स सिटी के नाम पर हमें घर बेचा, लेकिन स्पोर्ट्स सिटी डेवलप ही नहीं की। हम लोगों ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई है।‘ स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट में 70% ग्रीन एरिया था, जिसे स्पोर्ट्स एक्टिविटी के लिए डेवलप करना था। बाकी 28% में रेजिडेंशियल और 2% कॉमर्शियल एक्टिविटी के लिए डेवलप किया जाना था। लिहाजा इसके बाद हमने आसपास के एरिया में उस जगह की तलाश की, जहां स्पोर्ट्स सिटी प्रस्तावित है, यानी जिस जगह को स्पोर्ट्स एक्टिविटी के लिए डेवलप करना था।

थोड़ा आगे बढ़ने पर हमें नोएडा डेवलपमेंट अथॉरिटी की तरफ से लगा एक बोर्ड मिला। उस पर लिखा है- ‘ये जगह स्पोर्ट्स सिटी के लिए प्रस्तावित है। ये जमीन थ्री-सी ग्रीन्स डेवलपर्स के नाम पर अलॉट कर दी गई है। अगर कोई इसकी खरीद-बिक्री करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होगी। आदेशानुसार-नोएडा विकास प्राधिकरण।‘

फिर सवाल ये आया कि स्पोर्ट्स सिटी के लिए अलॉट जगह पर क्या कुछ भी नहीं हुआ। इसका जवाब हमें थोड़ा आगे बढ़ते ही मिल गया। खाली पड़ी जमीन के कुछ हिस्से में झुग्गियां दिखीं। वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग खेती भी कर रहे हैं। जमीन के एक बड़े हिस्से को ग्राउंड की तरह तैयार किया जा रहा था। हम जब इसे कैमरे में कैद करने लगे तो हमें रोक दिया गया।

अथॉरिटी ने माना- फोकस खेलों पर नहीं, सिर्फ ग्रुप हाउसिंग पर था इसके बाद हमने नोएडा स्पोर्ट्स सिटी को लेकर कैग की रिपोर्ट की पड़ताल की। CAG ने अपनी रिपोर्ट में सितंबर 2020 में नोएडा अथॉरिटी के एक ACEO रैंक के अधिकारी की जांच रिपोर्ट का जिक्र किया है। हालांकि, उस अधिकारी का नाम नहीं लिखा है।

CAG रिपोर्ट के पेज नंबर-182-183 पर लिखा है कि ACEO ने अपनी जांच में स्वीकार किया कि नोएडा अथॉरिटी के पास स्पोर्ट्स फैसिलिटी के कंस्ट्रक्शन के लिए क्लियर प्लान नहीं था। प्रोजेक्ट के काम का बिल्डर्स के बीच इस तरह से सबडिवीजन किया गया कि इनके बीच आपस में कोई को-ऑर्डिनेशन ही नहीं बन पा रहा था।

CAG की रिपोर्ट में ये भी जिक्र है कि नोएडा अथॉरिटी का एक्शन कुछ इस तरह से रहा कि स्पोर्ट्स फैसिलिटी के बजाय सिर्फ ग्रुप हाउसिंग प्रोजेक्ट के काम पर ही फोकस किया गया। इसमें स्पोर्ट्स के इंटरनेशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सिर्फ नाममात्र के लिए ध्यान दिया गया। यही वजह है कि स्पोर्ट्स सिटी का काम अभी तक कुछ शुरू नहीं हो सका।

इस पूरे प्रोजेक्ट में 3 मेन बिल्डर्स के नाम हैं। जानाडू, लोट्स ग्रीन और लॉजिक्स इन्फ्रा। इन तीनों ने आगे 84 कंपनियों को काम की जिम्मेदारी दे दी। मेरा मानना है कि इस पूरे घोटाले में अधिकारियों के नाम का खुलासा CAG को करना चाहिए था। आप अगर जांच कर रहे हैं तो उसमें पारदर्शिता लानी चाहिए।

आप देखिए इससे पहले भी एक मामले में कोर्ट के आदेश पर सुपरटेक की एक बिल्डिंग ढहा दी गई। इसमें गड़बड़ी करने वाले बिल्डर और अधिकारियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

Umh News india

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