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​​​​​​​GPR सर्वे में ज्ञानवापी के नीचे 2000 साल पुराना मंदिर, BHU आर्कियोलॉजिस्ट का दावा

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ज्ञानवापी में तहखाने के नीचे मंदिर का 2000 साल पुराना इतिहास है। ASI सर्वे में हुआ ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार (GPR) सर्वे इसी ओर इशारा कर रहा है। रिपोर्ट में GPR सर्वे कहता है कि मंदिर के तहखाने से 4 से 6 मीटर नीचे कंकड़ को कूटकर बड़ा फर्श बनाया गया है। वहीं, तहखाने के 3 मीटर नीचे भी कुछ ऐसा ही एक शेप बना है।”

यह दावा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के सीनियर आर्कियोलॉजिस्ट और प्राचीन इतिहास विशेषज्ञ प्रोफेसर अशोक सिंह का है।​ उनका दावा है कि ​​​​​​ज्ञानवापी के नीचे मंदिर के दो पुराने फ्लोर भी हैं। इसके साथ ही 3-4 मीटर चौड़ा तहखाना और 2 मीटर चौड़ा कुआं भी है। जहां आज तक न कोई पहुंच पाया है और न ही किसी को इसके बारे में पता चला है।

उनका कहना है कि GPR में भले ही उन दो फर्श का इतिहास नहीं पता चल हो, लेकिन लगातार उत्खनन कराने वाले आर्कियोलॉजिस्ट उसकी गहराई से इतिहास का पता लगा सकते हैं। अशोक सिंह ने ज्ञानवापी की ASI सर्वे रिपोर्ट के कन्क्लूजन की एनालिसिस की है। पेज नंबर-130 और 131 पर GPR सर्वे के पॉइंट नंबर 4, 5 और 6 में इन्हीं बातों का जिक्र किया जा रहा है

गुरुवार शाम यानी 25 जनवरी को ASI सर्वे की 839 पेज की सर्वे रिपोर्ट पब्लिक हुई। इसमें ASI ने दावा किया कि मस्जिद से पहले यहां पर बहुत बड़ा हिंदू मंदिर था। इसके 32 सबूत मिले हैं। रिपोर्ट से यह भी साफ है कि परिसर में मंदिर होने के सबूत छिपाने की कोशिश की गई, फिर भी इन्हें मिटाया नहीं जा सका।

17वीं शताब्दी में जब औरंगजेब का शासन था। उस वक्त ज्ञानवापी स्ट्रक्चर को तोड़ा गया। कुछ हिस्सों को मॉडिफाई किया गया है। रिपोर्ट में मंदिर के 6 मीटर नीचे एक बड़े फर्श के बारे में जिक्र किया गया है। मगर ये किस मटेरियल से बनाया गया है? किस राजवंश और एग्जैक्ट किस साल में बना है? यह पता नहीं चल पाया है।

पॉइंट नंबर-1: उत्तरी हॉल में GPR सर्वे किया गया। यहां पर 1-2 मीटर नीचे फ्लोर पर सिंक होल टाइम कैविटी दिखाई दी। यानी फ्लोर पर कोई बड़ा सा छेद है। फर्श पर मोर्टार यानी कि कोई ठोस चीज का काफी जमाव है।

पॉइंट नंबर-2: 4-6 मीटर नीचे कंकड़ों का आयताकार स्थान है। इसका एक हिस्सा खुला हुआ है। दरवाजा दक्षिण की ओर खुलता है। मंदिर के दक्षिणी गलियारे में 4-6 मीटर नीचे जाने पर ऐसा है। ठीक ऐसा ही उत्तरी गलियारे की ओर एक आकार तहखाने से 3 मीटर नीचे है।

पॉइंट नंबर-3: 3-4 मीटर चौड़ा एक तहखाना है। इसमें 2 मीटर चौड़ा एक कुआं भी है।

प्रोफेसर अशोक सिंह का कहना है, ”आर्कियोलाजी में माना जाता है कि जहां कहीं भी यदि पुरातात्विक साक्ष्य मिलते हैं, तो उनके हर 1 मीटर नीचे जाने पर पूरी की पूरी शताब्दी बदलती जाती है। हम समय में पीछे चलते जाते हैं। एग्जाम्पल के लिए वाराणसी के बभनियांव गांव की खुदाई को लीजिए।

3 साल पहले गांव में एक 10X10 फीट का एक ट्रेंच लेकर खुदाई की गई, तो पहले वहां पर 500 साल पुरानी वस्तुएं मिलीं। फिर 1000 साल पुरानी, 1500 साल और 2000 साल प्राचीन वस्तुओं और पूजा की सामग्री, मंदिर की दीवार, प्रदक्षिणा पथ आदि मिले। हम नीचे गए और मंदिर का इतिहास बदलता गया।

प्रोफेसर सिंह का कहना है कि भारत की प्राचीन मान्यता है कि जहां पर मंदिर होता है, वहां कोई हिंदू घर बनाकर नहीं रहता। वहां पर यदि मंदिर जीर्ण या टूट जाता है, तो उसका जीर्णोद्धार या दूसरा मंदिर बना दिया जाता है। ज्ञानवापी के मसले पर ऐसा ही लगता है कि जितना नीचे जाएंगे, ज्योर्तिलिंग विश्वेश्वर के बारे में उतनी ही रहस्यमयी बातें सामने आएंगी। भारत के इतिहास में मंदिर की हर 200-300 जीर्णोद्धार और रिपेयरिंग की जाती थी। ऐसे में आदि विश्वेश्वर मंदिर का भी कई बार जीर्णोद्धार हुआ है। हो सकता है कि ये 5 हजार साल पहले भी जा सकता है।

‘बिना कुछ तोड़े भी खुदाई संभव’
प्रोफेसर का कहना है कि सर्वे के लिहाज से काफी बेहतर काम है। अब आगे की जानकारियों को और पुख्ता करने के लिए खुदाई का काम शुरू किया जा सकता है। जरूरी नहीं कि खुदाई के लिए स्ट्रक्चर के किसी हिस्से को तोड़ दिया जाए। परिसर के बाहर कुछ दूरी पर 10X10 फीट का एक ट्रेंच लिया जा सकता है।

इस ट्रेंच में नीचे जाने पर हो सकता है कि प्राचीन वाले मंदिर की दीवार मिल जाए। फिर इस दीवार के सहारे हम मंदिर के बाकी भागों तक भी पहुंच सकते हैं। ऐसे में मंदिर का पूरा इतिहास और स्ट्रक्चर का पता चल सकेगा। ये कब टूटा, कब बना, क्यों टूटा, कैसे टूटा या फिर क्या-क्या बदलाव आए, इन सब सवालों का जवाब पता लगेगा। यदि वो साक्ष्य अंदर की ओर जा रहे हैं तो भी हम लोग उसके काल का पता लगा सकते हैं।

ASI ने 17 अगस्त को GPR सर्वे का डेटा कोर्ट को सब्मिट किया गया। पूरी रिपोर्ट में 109 बार GPR सर्वे शब्द का इस्तेमाल किया गया है। ज्ञापवापी परिसर में मौजूद तीनों गुंबद के नीचे से GPR तकनीक से टेस्टिंग हुई। पश्चिमी दीवार के ठीक पीछे किया गया। तहखाने की जमीन से सर्वे किया गया। हॉल एरिया, रूफ टॉप, प्लेटफॉर्म का भी सर्वे किया गया।

पता चला है कि प्राचीन काल की ईंटों और पत्थरों के टुकड़ों से मंदिर बना था। यहां पर सैंडस्टोन, प्राचीन काल की ईंट, लाइम मोर्टार और लाइम प्लास्टर आदि का इस्तेमाल हुआ है। चूना पत्थर और चूना प्लास्टर के अवशेष मिले हैं। दरवाजों पर बनी मूर्तियों को बुरी तरीके से तोड़ दिया गया है।

  • परिसर में मौजूद रहे विशाल मंदिर में बड़ा केंद्रीय कक्ष था। इसका प्रवेश द्वार पश्चिम से था, जिसे पत्थर की चिनाई से बंद किया है।
  • केंद्रीय कक्ष के मुख्य प्रवेश द्वार को जानवरों व पक्षियों की नक्काशी और एक सजावटी तोरण से सजाया गया था।
  • प्रवेश द्वार के ललाट बिंब पर बनी नक्काशी को काटा गया है। कुछ हिस्सा पत्थर, ईंट और गारे से ढक दिया गया है।
  • तहखाने में उत्तर, दक्षिण और पश्चिम के तीन कक्षों के अवशेष को भी देखा जा सकता है, पर कक्ष के अवशेष पूर्व दिशा और उससे भी आगे की ओर हैं। इसका विस्तार सुनिश्चित नहीं हो सका, क्योंकि पूर्व का क्षेत्र पत्थर के फर्श से ढका हुआ है। ज्ञानवापी परिसर में मौजूद मूर्ति के अवशेष
  • इमारत में पहले से मौजूद संरचना पर उकेरी गई जानवरों की आकृतियां थीं। 17वीं सदी की मस्जिद के लिए ये ठीक नहीं थे, इसलिए इन्हें हटा दिया गया, पर अवशेष हैं।
  • मस्जिद के विस्तार व स्तंभयुक्त बरामदे के निर्माण के लिए पहले से मौजूद मंदिर के कुछ हिस्सों जैसे खंभे, भित्तिस्तंभ आदि का उपयोग बहुत कम किया है, जिनका उपयोग किया है, उन्हें जरूरत के अनुसार बदला है।
  • इमारत की पश्चिमी दीवार (पहले से मौजूद रहे मंदिर का शेष भाग) पत्थरों से बनी है और पूरी तरह सुसज्जित की गई है।
  • उत्तर और दक्षिण हॉल के मेहराबदार प्रवेश द्वारों को रोक दिया गया है। उन्हें हॉल में बदल दिया गया है। सर्वे के दौरान मिला शिलालेख, जो संस्कृत भाषा से मिलता-जुलता है।
  • उत्तर दिशा के प्रवेश द्वार पर छत की ओर जाने के लिए बनी सीढ़ियां आज भी इस्तेमाल में हैं, जबकि छत की ओर जाने वाले दक्षिण प्रवेश द्वार को पत्थर से बंद किया गया है।
  • रिपोर्ट कहती है कि किसी भी इमारत की कला और वास्तुकला न केवल उसकी तारीख, बल्कि उसके स्वभाव का भी संकेत देती है। केंद्रीय कक्ष का कर्ण-रथ और प्रति-रथ पश्चिम दिशा के दोनों ओर दिखाई देता है।
  • सबसे महत्वपूर्ण चिह्न ‘स्वस्तिक’ है। एक अन्य बड़ा प्रतीक शिव का ‘त्रिशूल’ है

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