भारत के 13 अखाड़ो से मान्यता पर ही बना जा सकता है महामंडलेश्वर
अखाड़ों में महामंडलेश्वर का पद वैभव व प्रभावशाली होता है। छत्र-चंवर लगाकर चांदी के सिंहासन पर आसीन होकर महामंडलेश्वर की सवारी निकलती है। महामंडलेश्वर का जीवन त्याग से परिपूर्ण होता है। यह पदवी पाने के लिए पांच स्तरीय जांच, ज्ञान-वैराग्य की परीक्षा में खरा उतरना पड़ता है। पदवी मिलने के बाद तमाम प्रतिबंध से जीवनभर बंधकर रहना पड़ता है। उसकी अनदेखी करने पर अखाड़े से निष्कासित हो जाते हैं।
अखाड़ों से कोई व्यक्ति संन्यास अथवा महामंडलेश्वर की उपाधि के लिए संपर्क करता है तो उसे अपना नाम, पता, शैक्षिक योग्यता, सगे-संबंधियों का ब्योरा और नौकरी-व्यवसाय की जानकारी देनी होती है। अखाड़े के थानापति के जरिए उसकी पड़ताल कराई जाती है।
थानापति की रिपोर्ट मिलने पर अखाड़े के सचिव व पंच अलग-अलग जांच करते हैं। कुछ लोग संबंधित व्यक्ति के घर जाकर परिवारीजनों व रिश्तेदारों से संपर्क करके सच्चाई का पता करते हैं। जहां से शिक्षा ग्रहण किए होते हैं उस स्कूल-कालेज भी संतों की टीम जाती है।
स्थानीय थाना से जानकारी मांगी जाती है कि कोई आपराधिक संलिप्तता तो नहीं है। इसकी जांच पुलिस से कराई जाती है। समस्त रिपोर्ट अखाड़े के सभापति को दी जाती है। वह अपने स्तर से जांच करवाते हैं। फिर अखाड़े के पंच उनके ज्ञान की परीक्षा लेते हैं। उसमें खरा उतरने पर महामंडलेश्वर की उपाधि देने का निर्णय होता है।
होनी चाहिए यह योग्यता
महामंडलेश्वर का पद जिम्मेदारी वाला है। इसके लिए शास्त्री, आचार्य होना जरूरी है, जिसने वेदांग की शिक्षा हासिल कर रखी हो, अगर ऐसी डिग्री न हो तो व्यक्ति कथावाचक हो, उसके वहां मठ होना आवश्यक है। मठ में जनकल्याण के लिए सुविधाओं का अवलोकन किया जाता है।
देखा जाता है कि वहां पर सनातन धर्मावलंबियों के लिए विद्यालय, मंदिर, गोशाला आदि का संचालन कर रहे हैं अथवा नहीं? अगर अपेक्षा के अनुरूप काम होता है तो पदवी मिल जाती है। वहीं, तमाम डॉक्टर, पुलिस-प्रशासन के अधिकारी, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिवक्ता व राजनेता भी सामाजिक जीवन से मोहभंग होने पर संन्यास लेते हैं। ऐसे लोगों को अखाड़े महामंडलेश्वर बनाते हैं। इनके लिए संन्यास में उम्र की छूट रहती है। वह दो-तीन वर्ष तक संन्यास लिए रहते हैं तब भी महामंडलेश्वर बनाए जाते हैं।
रहती है यह पाबंदी
- घर-परिवार के लोगों से दूरी रखनी पड़ती है। अगर संपर्क सामने आता है तो अखाड़े से निष्कासित हो जाते हैं।
- चारित्रिक दोष नहीं लगना चाहिए।
- आपराधिक छवि के व्यक्ति से संबंध नहीं होना चाहिए।
- भोग-विलासिता युक्त जीवन नहीं होना चाहिए।
- किसी व्यक्ति की जमीन अथवा दूसरी संपत्ति पर कब्जा करने का आरोप नहीं लगना चाहिए।
- मांस-मदिरा के सेवन से दूर रहना होगा।
महामंडलेश्वर सनातन धर्म और अखाड़ों द्वारा दी जाने वाली एक सर्वोच्च आध्यात्मिक उपाधि है। यह पद किसी बड़े संत, मठाधीश या आध्यात्मिक गुरु को दिया जाता है जिनका जीवन त्याग, तप और समाज कल्याण के लिए समर्पित हो
धार्मिक ज्ञान और दीक्षा: सबसे पहले संत को संन्यास की दीक्षा लेनी होती है। उन्हें वेद, पुराण, गीता और अन्य शास्त्रों का गहन ज्ञाता होना चाहिए।
कठोर साधना और वैराग्य: व्यक्ति का जीवन सांसारिक मोह-माया से मुक्त और विवादों से दूर होना चाहिए। साधु को अपना परिवार और घर-संसार त्यागना पड़ता है
अखाड़े की संस्तुति: कोई भी संत सीधे महामंडलेश्वर नहीं बन सकता। इसके लिए उसे भारत के 13 मान्यता प्राप्त अखाड़ों में से किसी एक से जुड़ना होता है। अखाड़े के वरिष्ठ साधु और संत उस व्यक्ति के कार्यों, ज्ञान और चरित्र की परीक्षा लेते हैं
पट्टाभिषेक और चादर विधि: जब अखाड़ा संत की योग्यता से संतुष्ट हो जाता है, तो कुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में उनका पट्टाभिषेक (राज्याभिषेक की तरह) किया जाता है।
अधिकार और दायित्व: उपाधि मिलने के बाद उन्हें अखाड़े की ओर से ‘चादर’ भेंट की जाती है। इसके बाद वे उस अखाड़े या क्षेत्र के मठों और आश्रमों के प्रमुख (महान और श्रेष्ठ) बन जाते हैं।
1. शैव (दशनामी) अखाड़े – (कुल 7 अखाड़े जो भगवान शिव की पूजा करते हैं)
- श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी
- श्री पंच अटल अखाड़ा
- श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी
- श्री तपोनिधि आनंद अखाड़ा
- श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा (यह सबसे बड़ा अखाड़ा है)
- श्री पंचदशनाम आवाहन अखाड़ा
- श्री पंचदशनाम अग्नि अखाड़ा
2. वैष्णव (बैरागी) अखाड़े – (कुल 3 अखाड़े जो भगवान विष्णु के उपासक हैं)
- श्री दिगंबर अनी अखाड़ा
- श्री निर्वानी अनी अखाड़ा
- श्री पंच निर्मोही अनी अखाड़ा
3. उदासीन और निर्मल अखाड़े – (कुल 3 अखाड़े जो सिख गुरुओं की परंपरा का पालन करते हैं)
- श्री पंचायती बड़ा उदासीन अखाड़ा
- श्री पंचायती नया उदासीन अखाड़ा
- श्री निर्मल पंचायती अखाड़ा

