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जाति और हिंदू धर्म को लेकर क्या थे अंबेडकर के विचार!

अगर ये कहा जाए कि जाति और धर्म को जितने बेहतर तरीके से भारतीय राजनीति में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सोचा समझा और जाना, उतना किसी और नेता ने नहीं, तो ये बात शायद एकदम सही होगी. जाति और धर्म को लेकर उनके विचार बहुत तार्किक, गहरे और क्रांतिकारी सोच वाले थे. इसे लेकर उनके विचार केवल सामाजिक आलोचना नहीं थे बल्कि ऐसे नैतिक-सामाजिक व्यवस्था की रूपरेखा भी थे, जो कहीं बेहतर साबित हो सकते थे. उनकी किताबों, भाषणों और लेखों से इस बारे में बेहतर तरीके से समझा जा सकता है.

उनकी दो किताबें “एनीहिलेशन ऑफ कास्ट” यानि जाति का विनाश और “द बुद्धा एंड हिज धम्मा” यानि बुद्ध और उनका धम्म के जरिए जाति और धर्म को लेकर उनके विचारों को समझा जा सकता है. वह साफ कहते थे, जाति केवल सामाजिक विभाजन नहीं, बल्कि “मानवता के खिलाफ एक संगठित प्रणाली” है. उन्होंने लिखा, “जाति व्यवस्था न केवल श्रम का विभाजन है, बल्कि श्रमिकों का विभाजन है.”

बाबासाहेब अंबेडकर का पूरा जीवन और लेखन जाति और धर्म की सूक्ष्म मीमांसा के इर्द-गिर्द घूमता है. उनके लिए ये केवल सामाजिक श्रेणियां नहीं थीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था थी जिसने करोड़ों लोगों को गरिमापूर्ण जीवन से वंचित कर दिया था.

उनका मानना था कि जाति व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व तीनों को नष्ट करती है. यह जन्म के आधार पर व्यक्ति की नियति तय करती है, जो किसी भी आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में कैसे स्वीकार किया जा सकता है.
उनके अनुसार जाति एक धार्मिक-सांस्कृतिक समस्या भी थी. उन्होंने साफ कहा कि जाति व्यवस्था का आधार हिंदू धर्म के शास्त्रों में है. उन्होंने लिखा, “आप शास्त्रों को नष्ट किए बिना जाति को समाप्त नहीं कर सकते.” जब तक धार्मिक मान्यताओं और ग्रंथों में निहित जातिगत सोच को चुनौती नहीं दी जाएगी, तब तक सामाजिक सुधार अधूरा रहेगा.

हिंदू धर्म के प्रति क्या दृष्टिकोण था?

अंबेडकर हिंदू धर्म के मौजूदा स्वरूप के कटु आलोचक थे. उनका मानना था कि ये धर्म समानता पर नहीं, बल्कि असमानता पर आधारित है. वह कहते थे, “धर्म मनुष्य के लिए है, न कि मनुष्य धर्म के लिए.” उन्होंने कहा,

“हिंदू धर्म एक ऐसा धर्म है जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को नहीं मानता.”

उनकी आलोचना उस विशेष धार्मिक संरचना की थी जो भेदभाव को वैध ठहराती है. वह धर्म के खिलाफ नहीं थे. धर्म को समाज के लिए जरूरी मानते थे लेकिन उन्होंने सही धर्म की परिभाषा दी. उनके अनुसार,
– धर्म का उद्देश्य नैतिकता होना चाहिए
– धर्म व्यक्ति को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाए
– धर्म तर्कसंगत और मानवीय होना चाहिए

बौद्ध धर्म के बारे में क्या कहा

1956 में भीमराव रामजी अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया. ये केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति थी. उन्होंने अपनी किताब द बुद्धा एंड हिज धम्मा में बताया कि गौतम बुद्ध का धर्म तर्क और अनुभव पर आधारित है. जाति और जन्म के भेद को नकारता है. करुणा और समानता पर आधारित है. अंबेडकर ने कहा, “मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सिखाता है.”

क्या अंबेडकर को लगता था कि जाति खत्म हो सकती है

अंबेडकर का जवाब स्पष्ट था, हां, लेकिन इसके लिए कठोर सामाजिक और वैचारिक बदलाव जरूरी हैं. उन्होंने इसके लिए कुछ उपाय सुझाए.
– अंतर्जातीय विवाह
– शिक्षा और जागरूकता
– धार्मिक मान्यताओं की आलोचना
– कानून और संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका इसी सोच का विस्तार थी, जहां उन्होंने समानता और न्याय को मूल आधार बनाया. उनके लिए समानता केवल कानूनी अधिकार नहीं थी, बल्कि सामाजिक व्यवहार का हिस्सा होनी चाहिए. उन्होंने कहा, “राजनीतिक समानता तब तक टिक नहीं सकती जब तक सामाजिक और आर्थिक समानता न हो.”जब तक समाज में सम्मान और अवसर की समानता नहीं होगी, लोकतंत्र अधूरा रहेगा.

अंबेडकर ने तर्क दिया कि हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था कोई विसंगति नहीं है, बल्कि इसका अनिवार्य हिस्सा है. उनके अनुसार, जब तक हिंदू अपने धर्मशास्त्रों की पवित्रता में विश्वास करना नहीं छोड़ते, वे जाति से मुक्त नहीं हो सकते.

महाड़ सत्याग्रह के दौरान उन्होंने ‘मनुस्मृति’ जलाई थी. उनका कहना था कि यह ग्रंथ अन्याय और असमानता का प्रतीक है. उनके अनुसार, जाति को बनाए रखने के लिए धार्मिक पवित्रता का जो आवरण ओढ़ाया गया है, उसे हटाना अनिवार्य है.

धर्म और राजनीति के संबंध पर क्या कहते थे?

अंबेडकर ने धर्म को पूरी तरह निजी नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक नैतिकता का स्रोत माना लेकिन वे इस बात के खिलाफ थे कि धर्म राजनीति को नियंत्रित करे. उनका मानना था, राज्य धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए. कानून सभी के लिए समान हो. धर्म का उपयोग भेदभाव के लिए न हो. यह विचार आज के भारतीय

अंबेडकर ने जाति को एक सामाजिक बुराई के रूप में देखा जिसने राष्ट्र की एकता को तोड़ा. वहीं धर्म को उन्होंने एक नैतिक शक्ति के रूप में देखा, बशर्ते वह मनुष्य को गुलाम बनाने के बजाय स्वतंत्र करे. उनका मानना था कि एक न्यायपूर्ण समाज तभी बन सकता है जब व्यक्ति की पहचान उसकी ‘जाति’ से नहीं, बल्कि उसके ‘चरित्र’ और ‘मानवता’ से हो.

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