चीन की 45 मिनट की देरी ने डुबो दिया नेपाल?
Nepal Flash Flood Update: नेपाल लगातार प्राकृतिक आपदाएं झेलने वाला देश है लेकिन बुधवार को आए फ्लैश फ्लड ने इस देश के सीने पर एक और बड़ा जख्म दे दिया है. साल 2015 के भूकंप के बाद नेपाल ने अब कुदरत का इतना विकराल रूप देखा है. यहां के अधिकारी बताते हैं कि नेपाल ने इतिहास में कभी इतनी भीषण बर्बादी नहीं देखी. ये देश पता लगाने में जुटा है कि आखिर क्या वजह थी, जो पानी का ऐसा बड़ा सैलाब आया और भनक तक नहीं लगी. जब तिब्बत में ग्लेशियर टूट रहा था या हिमनद खिसक रहा था, तो चीन के पास जानकारी क्यों नहीं हुई? टेक्नोलॉजी में एक्सपर्ट चीन को अगर पता था, तो नेपाल को वक्त रहते बताया क्यों नहीं?
नेपाल के रसुवा में भोटेकोशी नदी की भीषण बाढ़ ने आई और अपने पीछे कुदरत से इंसानियत के हारने की कहानी छोड़ गई. अब इस त्रासदी के चलते नेपाल और चीन के बीच विवादास्पद स्थिति हो गई है. नेपाल की ओर से यह आशंका जताई गई कि चीनी हिस्से में बनी जियोलॉजिकल डिजास्टर डैम के ढहने से बाढ़ आई और चीन ने समय पर चेतावनी नहीं दी. उधर चीन ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे फर्जी खबर बताया.
चीन ने दी नेपाल मामले पर सफाई.चीनी दूतावास का कहना है कि भूकंप जैसी घटना नेपाली हिस्से में हुई, जिससे कीचड़ का सैलाब आया. अब सवाल उठ रहा है -क्या चीन इस तबाही को रोक सकता था या कम से कम नुकसान कम कर सकता था?
अप्रैल में नेपाल ने चीन से भोटेकोशी किनारे बन रही सेफ्टी वॉल का काम रोकने का अनुरोध किया था. नेपाल को डर था कि निर्माण से नदी का प्राकृतिक मार्ग प्रभावित हो सकता है. बाढ़ के बाद यही सवाल फिर उठ खड़ा हुआ है. अगर नदी के किनारे दीवार या अन्य संरचनाएं उसके स्वाभाविक बहाव को बाधित करती हैं, तो मलबा और पानी का दबाव बढ़ सकता है. हालांकि अभी इस बात का कोई पक्का प्रमाण नहीं है कि सेफ्टी वॉल ने बाढ़ को जन्म दिया, लेकिन नदी इंजीनियरिंग के प्रभाव की जांच जरूरी है.
क्या तिब्बत में तेज निर्माण ने प्राकृतिक जल निकासी बदल दी?
तिब्बत में सड़कें, पुल, सीमा सुविधाएं, बिजली परियोजनाएं और रिटेनिंग वॉल्स तेजी से बने हैं. बाढ़ का तात्कालिक कारण बर्फ-चट्टान का ढहना और मलबे का बहाव बताया जा रहा है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या निर्माण कार्यों ने पानी और मलबे के प्राकृतिक रास्तों को संकरा या मोड़ दिया. अभी यह साबित नहीं हुआ कि निर्माण ने बाढ़ पैदा की लेकिन संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खुदाई और संरचनाएं जल निकासी को प्रभावित कर सकती हैं.
बाढ़ का स्रोत तिब्बती हिस्से से जुड़ा बताया जा रहा है. नेपाली सूत्रों के मुताबिक तिब्बत के केरुंग से आई भीषण बाढ़ की चेतावनी नेपाल को 45 मिनट की देरी से मिली. चीनी मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं कि तिब्बत में बाढ़ स्थानीय समय के मुताबिक साढ़े 10 बजे आ चुकी थी. ये नेपाल से 25-30 किलोमीटर की दूरी पर है और दोनों देशों के वक्त में सवा 2 घंटे का अंतर. ऐसे में नेपाल तक जानकारी पहुंचने में 45 मिनट की देरी हुई. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीनी पक्ष के पास ऊपरी इलाके में हुई घटना की जानकारी पहले थी. दोनों देशों के बीच रियल-टाइम फ्लड वार्निंग सिस्टम कितना प्रभावी था? समय पर चेतावनी मिलने पर नीचे के इलाकों में लोगों को निकालने का अधिक समय मिल सकता था
क्या तिब्बत का इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल आपदा जोखिम बढ़ा रहा है?
तिब्बत में हिमालय वाले एरिया पर तेज विकास हो रहा है लेकिन यही क्षेत्र ग्लेशियर, लैंडस्लाइड, जीएलओएफ और भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील है. विकास की रफ्तार क्या इकोसिस्टम की क्षमता से आगे निकल रही है? इस बाढ़ में चीनी हिस्से का ग्यिरोंग क्षेत्र और वहां का इंफ्रास्ट्रक्चर भी प्रभावित हुआ यानी चरम मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के आगे चीन का अपना निर्माण भी असुरक्षित है. विकास जरूरी है लेकिन ये बड़ी तबाही का कारण बन सकता है.
क्या बाढ़ भविष्य की बड़ी जल आपदा की चेतावनी है?
भोटेकोशी का पानी त्रिशूली, नारायणी/गंडक होते हुए बिहार तक पहुंचता है. तिब्बत में ग्लेशियर और चरम मौसमी घटनाएं बढ़ने से नीचे के देशों के लिए खतरा बढ़ सकता है. चीन की बड़ी जलविद्युत और जल अवसंरचना परियोजनाएं भी रणनीतिक चिंता का विषय हैं. भविष्य में ग्लेशियर, लैंडस्लाइड, जीएलओएफ और इंफ्रास्ट्रक्चर का संयोजन कहीं अधिक विनाशकारी आपदा पैदा कर सकता है. यह घटना सिर्फ नेपाल की नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की चेतावनी है. कुल मिलाकर, चीन शायद बाढ़ को पूरी तरह रोक नहीं सकता था क्योंकि प्राकृतिक तत्व भी शामिल हैं. विवाद इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि जानें गईं और जवाबदेही साफ नहीं है.

