पुखराज धारण करने से पहले जानिए ये जरूरी नियम
अयोध्या: वैदिक ज्योतिष में पुखराज को देवगुरु बृहस्पति का प्रमुख रत्न माना जाता है. मान्यता है कि यह रत्न ज्ञान, विवेक, सम्मान, समृद्धि और सकारात्मक सोच का प्रतीक होता है. हालांकि ज्योतिषाचार्य यह भी सलाह देते हैं कि पुखराज बिना कुंडली का परीक्षण कराए कभी धारण नहीं करना चाहिए, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए यह समान रूप से लाभकारी नहीं होता. ऐसी स्थिति में चलिए इसे धारण करने की पूरी विधि जानते हैं.
अयोध्या के ज्योतिषाचार्य पंडित कल्कि राम बताते हैं कि पुखराज सामान्यत पीले रंग का होता है, जबकि क्रीम रंग का पारदर्शी पुखराज भी उत्तम माना जाता है. उनका कहना है कि अच्छा पुखराज हाथ में लेने पर अपेक्षाकृत वजनी महसूस होता है और उसकी चमक स्वाभाविक होती है. यह रत्न देवगुरु बृहस्पति का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए इसे धारण करने से व्यक्ति के जीवन में ज्ञान, विवेक और सकारात्मकता का संचार होने की मान्यता है.
आत्मविश्वास और साहस में करता बढ़ोतरी
पंडित कल्कि राम बताते हैं कि जिन लोगों में निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती है या जो बार-बार असमंजस की स्थिति में रहते हैं, उनके लिए उचित सलाह के बाद धारण किया गया पुखराज लाभकारी माना जाता है. यह व्यक्ति के आत्मविश्वास और साहस को बढ़ाने में सहायक माना जाता है. साथ ही ऐसे लोगों से संपर्क कराने में मदद करता है, जो जीवन में यश, सम्मान और उन्नति दिलाने वाले साबित होते हैं. इसके प्रभाव से अच्छे लोगों का साथ मिलता है, बिगड़े हुए कार्य बनने लगते हैं और व्यक्ति के भीतर दान, धर्म तथा समाजहित की भावना विकसित होती है. ऐसी मान्यता है कि पुखराज धारण करने वाला व्यक्ति उच्च विचारों वाला और प्रगतिशील सोच रखने वाला बनता है. हालांकि पंडित कल्कि राम चेतावनी भी देते हैं कि यदि पुखराज किसी व्यक्ति की कुंडली के अनुकूल नहीं है, तो इसके विपरीत परिणाम भी सामने आ सकते हैं. ऐसे में पेट संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, बनते हुए काम बिगड़ने लगते हैं और बिना कारण धन की हानि होने लगती है. परिवार में विवाद और क्लेश बढ़ सकते हैं, व्यापार या नौकरी में कठिनाइयां आ सकती हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है. इसलिए केवल यह सोचकर कि किसी की राशि बृहस्पति से संबंधित है, पुखराज धारण नहीं करना चाहिए.
उनके अनुसार, पुखराज धारण करने से पहले किसी योग्य ज्योतिषाचार्य से कुंडली का परीक्षण अवश्य कराना चाहिए. रत्न कितने रत्ती का होना चाहिए, किस धातु में पहनना चाहिए और किस दिन धारण करना उचित रहेगा, इसका निर्णय भी जन्मपत्री के आधार पर ही किया जाना चाहिए. सामान्यतः पुखराज गुरुवार के दिन धारण किया जाता है.
विधिवत पूजन के बाद ऐसे करें धारण
पंडित कल्कि राम के अनुसार, पुखराज को धारण करने से पहले उसका विधिवत पूजन करना भी आवश्यक माना गया है. रत्न को एक रात पहले पंचामृत ,दूध, दही, घी, शहद और शक्कर में रख दें. अगले दिन प्रातः उसे निकालकर गंगाजल से स्नान कराएं, फिर सामान्य जल से धोकर धूप-दीप अर्पित करें. इसके बाद “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः” मंत्र की एक माला यानी 108 बार जप करें और देवगुरु बृहस्पति का ध्यान करते हुए यश, कीर्ति, वैभव, समृद्धि तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करें. इसके बाद श्रद्धापूर्वक पुखराज धारण करें.
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि उचित विधि और सही सलाह के साथ धारण किया गया पुखराज व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला रत्न माना जाता है. लेकिन बिना कुंडली की जांच और विशेषज्ञ परामर्श के इसे पहनना उचित नहीं है.

