GAME & OTHER STORIES

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा, किसने लिखा ये हिट नारा!

हाल ही में जब बंगाल की चुनाव सभा में यूपी के मुख्यमंत्री योगी ने ये कहा – तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, हिट नारा स्वामी विवेकानंद ने बोला था तो सोशल मीडिया पर इसे लेकर चर्चाओं की झड़ी शुरू हो गई. दरअसल ये प्रसिद्ध नारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने वर्ष 1944 में म्यांमार में एक भाषण के दौरान बोला था. उसके बाद ये इतना फेमस हो गया कि आजादी की लड़ाई में नहीं बल्कि आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ा रहता है.

नेताजी 4 जुलाई 1944 को बर्मा (अब म्यांमार) में आजाद हिंद फौज की एक रैली को संबोधित कर रहे थे. उसमें बड़ी संख्या में म्यांमार में रह रहे भारतीय भी आए थे. अपने इस भाषण के जरिए नेताजी ने म्यांमार में रह रहे लोगों से मदद की गुहार भी की थी. इसके बाद तो वहां आए भारतीयों ने दिल खोलकर जो हो सकता था, वो दान आजाद हिंद फौज के लिए किया. आभूषणों और रुपए पैसे का ढेर लग गया.

नेताजी ने ये मशहूर नारा अंग्रेजी भाषण में बोला

ये नारा सुभाष चंद्र बोस का सबसे मशहूर नारा है. उनका असली भाषण अंग्रेजी में था. जिसमें उन्होंने जाहिर किया था – फ्रेंड्स, माई सोल्डर्स, लेट योर बैटल क्राई बी- गिव मी ब्लड एंड आई प्रॉमिस यू फ्रीडम. आमतौर पर उनके भाषणों का हिंदी अनुवाद करने का काम सचिव की भूमिका देख रहे आबिद हसन करते थे, जो इन भाषणों में उर्दू के असरदार शब्दों को भी पिरोते थे.

सुभाष ने ये भाषण इम्फाल-कोहिमा की लड़ाई हारने के बाद दिया था. आईएनए को भारी नुकसान हुआ था. सैनिकों का मनोबल टूट रहा था. पैसे-राशन की कमी थी. तब उन्होंने अपने भाषण में लोगों से मदद की अपील की थी. तब उन्होंने कहा था, हमने आजादी पाने के लिए एक सेना बनाई है. हम ऐसे पुरुषों और महिलाओं की जरूरत है जो मुश्किल से मुश्किल हालात में हमारे साथ कदम मिला सकें और चलें. मुझको केवल पैसा नहीं चाहिए बल्कि लोग (ब्लड) चाहिए, आप मुझे खून दीजिए और मैं वादा करता हं कि आजादी लाकर रहूंगा. यानी ये केवल जोश नहीं था. बलिदान की सीधी मांग थी. “खून” का मतलब था पैसा, आराम, घर-परिवार और जरूरत पड़े तो जान.

आमतौर पर ये कहा जाता है कि नेताजी अपने भाषण खुद लिखते थे लेकिन वो इसे अक्सर अंग्रेजी में लिखते थे. उसके अनुवाद का जिम्मा उनके विश्वस्त और सचिव की भूमिका निभाने वाले आबिद हसन की होती थी. लिहाजा जब सुभाष ये नारा अंग्रेजी में अपने भाषण में बोला तो हिंदी में इसका अनुवाद किया गया, “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”. वो इतना पॉपुलर हुआ कि ओरिजिनल अंग्रेजी लाइन दब गई. हालांकि ये बात सही है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के लिए कुछ हिट नारे उसके विश्वस्त सहयोगी आबिद हसन ने जरूर लिखे थे.

कैसे हुई आबिद हसन से मुलाकात

आबिद हसन से नेताजी की पहली मुलाकात काफी दिलचस्प है. वो जर्मनी में हुई थी. आबिद हैदराबाद के रहने वाले थे. जर्मनी में इंजीनियरिंग पढ़ने गए थे. 1941 में सुभाष जब काबुल से जर्मनी पहुंचे, तो आबिद हसन को उनसे मिलाया गया. इसके बाद वह अपनी पढ़ाई और पीएचडी छोड़कर उनसे और आज़ाद हिंद फौज के साथ जुड़ गए.

वह नेताजी बोस के सेक्रेटरी, दुभाषिया बन गए. जब सुभाष पनडुब्बी से जर्मनी से जापान पहुंचे तो इस मुश्किल यात्रा में आबिद ही उनके साथ थे. “जय हिंद” नारा आबिद की ही देन माना जाता है.

1943-44 में आजाद हिंद फौन यानि इंडियन नेशऩल आर्मी को जोशीले नारे चाहिए थे. आबिद हसन उर्दू-हिंदी के शायराना मिजाज़ के थे. उन्होंने कई नारे लिखे.

आबिद का सबसे हिट नारा 

आबिद ने नेताजी के साथ आजाद हिंद फौज के लिए कई हिट नारे लिखे, जैसे – आज़ादी मुफ्त नहीं मिलती, कुर्बानी मांगती है. “जय हिंद” और “दिल्ली चलो” का नारा भी आबिद और सुभाष ने मिलकर पॉपुलर किया. आबिद हसन बाद में आजाद भारत के राजदूत भी बने.

जय हिंद नारे की भी कहानी रोचक है. आबिद हसन साफरानी की मुख्य ख्याति ‘जय हिंद’ का नारा देने के लिए है. नेताजी चाहते थे कि आजाद हिंद फौज के सैनिक एक-दूसरे का अभिवादन किसी धार्मिक शब्द के बजाय एक ऐसे शब्द से करें जो सबको साथ जोड़ सके. तब आबिद हसन ने ‘जय हिंद’ का सुझाव दिया था, जिसे नेताजी ने तुरंत स्वीकार कर लिया.

आजाद हिंद फौज की पूरी शब्दावली और नारों की संस्कृति को विकसित करने में आबिद हसन का बहुत बड़ा योगदान था. आबिद हसन की असली ताकत नेताजी के भाषणों को हिंदुस्तानी में ढालना था, ऐसी भाषा बनाना, जो सैनिकों में जोश भर दे.

आबिद हसन सफ़रानी सुभाष चंद्र बोस के “शैडो” कहलाते थे. वह उस्मानिया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट थे. फिर 1938 में इंजीनियरिंग पढ़ने जर्मनी के ड्रैसडेन टैक्निकल यूनिवर्सिटी में चले गए. जब नेताजी बोस को वह जर्मनी में मिले तो नेताजी को जर्मन कम लेकिन अंग्रेजी ठीक आती थी. आबिद हसन को जर्मन, अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी सब आती थीं. बोस ने देखते ही कहा — “तुम मेरे साथ काम करोगे.”आबिद ने हां में सिर हिलाया.

खुद आबिद हसन ने एक इंटरव्यू में कहा था: “नेताजी बोलते थे कि मैं उनकी जुबान हूं. मैं कहता था – नेताजी, आप हिंदुस्तान की जुबान हैं.”

आजादी के बाद आबिद हसन का क्या हुआ

आजादी के बाद भी आबिद हसन साफरानी का जीवन उतना ही गरिमामय रहा जितना कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान था. उन्होंने स्वतंत्र भारत की सेवा एक राजनयिक के रूप में की.

आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें भारतीय विदेश सेवा में शामिल किया. उन्होंने दुनिया के कई देशों में भारत के राजदूत और उच्चायुक्त के रूप में काम किया. नेहरू उनके बहुत प्रशंसक थे. विदेश सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वे अपने गृह नगर हैदराबाद लौट आए.

क्या स्वामी विवेकानंद ने भी आजादी का नारा दिया था

स्वामी विवेकानंद ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे सीधे राजनीतिक नारे नहीं दिए, क्योंकि उनका समय संगठित राजनीतिक आज़ादी के आंदोलन से थोड़ा पहले का था. उनका सबसे मशहूर वाक्य है – “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत”. हालांकि ये राजनीतिक नारा नहीं था. ये युवाओं में जागरण और आत्मविश्वास भरने वाला संदेश था. सुभाष चंद्र बोस उन्हें अपना आध्यात्मिक प्रेरणास्रोत मानते थे. महात्मा गांधी ने भी कहा कि विवेकानंद को पढ़कर उनका देशप्रेम बढ़ा.

आजादी की लड़ाई के तीन सबसे हिट नारे

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में वैसे तो दर्जनों प्रभावशाली नारे रहे लेकिन तीन नारों को “सबसे हिट” या प्रभावशाली माना जा सकता है.

Umh News india

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *