UPI MDR चार्ज पर रोक लगाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने यूपीआई पेमेंट पर MDR लगाने पर रोक लगाने से फिलहाल इनकार कर दिया है. हालांकि सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ इंडिया यानी NPCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. इन्हें चार हफ्ते में यह बताने को कहा है कि चार्ज क्यों लगाना जरूरी है. मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है.
याचिका में वित्त मंत्रालय की 14 और 15 सितंबर की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता ने 2,000 रुपये से अधिक के चुनिंदा P2M यानी Person-to-Merchant UPI ट्रांजैक्शन पर MDR लागू करने के फैसले को रद्द करने की मांग की है. नई व्यवस्था के तहत सामान्य P2M ट्रांजैक्शन पर 0.4 फीसदी MDR का प्रावधान किया गया है. यह व्यवस्था 15 अक्टूबर 2026 से लागू होनी है. सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि UPI के आने के बाद ब्लैक मनी से जुड़े ट्रांजैक्शन में कमी आई है. याचिका में नई MDR व्यवस्था के कानूनी आधार पर भी सवाल उठाया गया है. याचिकाकर्ता का कहना है कि 2,000 रुपये से अधिक के कुछ UPI भुगतान पर शुल्क लगाने का फैसला पर्याप्त वैधानिक सुरक्षा, पारदर्शिता और सार्वजनिक परामर्श के बिना लिया गया.
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि अगर इसे फीस या सरकारी शुल्क नहीं माना जा रहा है, तो फिर इस चार्ज की लीगल नेचर क्या है. उन्होंने यह भी पूछा कि कार्यपालिका के पास इस तरह का चार्ज तय करने का अधिकार किस सीमा तक है. कोर्ट ने सरकार से इस पूरे मामले के कानूनी और तकनीकी पहलुओं को स्पष्ट करने को कहा.
ASG आर वेंकटरमणी ने कहा कि डेबिट और क्रेडिट कार्ड से भुगतान करने में भी लागत आती है और UPI इससे अलग नहीं है. उन्होंने कहा कि MDR सरकार की ओर से की जाने वाली कोई वसूली नहीं है. यह पेमेंट सिस्टम से जुड़े पक्षों के बीच सेटलमेंट से जुड़ा शुल्क है, जिसे NPCI की व्यवस्था के जरिए लागू किया जाता है. सरकार के मुताबिक इस चार्ज से केंद्र सरकार को एक रुपया भी नहीं मिलेगा.

